भारत का पानी, पाकिस्तान की चीनी: सिंधु जल संधि के बीच इस्लामाबाद की इस दोमुंही चाल का पर्दाफाश

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और व्यापारिक मोर्चे पर पाकिस्तान का दोहरा चरित्र एक बार फिर दुनिया के सामने बेनकाब हो गया है। एक तरफ इस्लामाबाद लगातार कश्मीर राग अलापता रहता है और भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दुष्प्रचार करता है, तो दूसरी तरफ आर्थिक बदहाली के इस दौर में वह भारत के ही जल संसाधनों और रणनीतिक रियायतों का अनुचित लाभ उठाने से नहीं चूकता। ताजा मामला सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) और कृषि व्यापार से जुड़ा हुआ है, जहां पाकिस्तान भारत के हिस्से के पानी से पैदा होने वाली गन्ने की बंपर फसल और चीनी का व्यापार करने की जुगत में लगा है। इतना ही नहीं, अपनी आर्थिक तंगी से उबरने के लिए पाकिस्तानी हुक्मरान और व्यापारी उसी चीनी को पड़ोसी मुल्क से भारत की राजधानी दिल्ली तक सीधे निर्यात करने की फिराक में हैं। भारत के साथ दुश्मनी का ढोल पीटने वाले पाकिस्तान का यह दोमुंहापन अब पूरी तरह जगजाहिर हो चुका है, जिससे यह साफ साबित होता है कि जब बात पेट भरने और तिजोरी भरने की आती है, तो पाकिस्तान के सारे सिद्धांत हवा हो जाते हैं। आइए इस पूरी रिपोर्ट में विस्तार से जानते हैं कि किस तरह पाकिस्तान सिंधु जल संधि की आड़ में भारत विरोधी नीतियों के साथ-साथ आर्थिक साठगांठ की चालें चल रहा है।

सिंधु जल संधि का इतिहास और पाकिस्तान की रणनीतिक निर्भरता

भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से ‘सिंधु जल संधि’ (IWT) पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसे कूटनीति की दुनिया में सबसे उदार संधियों में गिना जाता है। इस संधि के तहत पूर्वी नदियों का नियंत्रण भारत को और पश्चिमी नदियों का नियंत्रण पाकिस्तान को सौंपा गया, लेकिन इसके बावजूद भारत ने पाकिस्तान के बड़े भूभाग को हरा-भरा रखने के लिए उसके हिस्से की नदियों के पानी के बेरोक-टोक प्रवाह को हमेशा सुनिश्चित किया। पंजाब और सिंध प्रांत के बड़े कृषि क्षेत्र आज भी उसी पानी से सिंचित होते हैं, जिस पर पाकिस्तान भारत को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ता। भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान अपनी कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत करने के लिए पूरी तरह से भारत की ओर से बहने वाले पानी पर निर्भर है। विडंबना यह है कि एक तरफ पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देकर भारत को नुकसान पहुंचाने की साजिशें रचता है, और दूसरी तरफ उसी भारत के पानी से पैदा होने वाली कृषि उपज के दम पर अपनी अर्थव्यवस्था को सांस देने की कोशिश करता है।

चीनी की पैदावार और पाकिस्तानी हुक्मरानों की व्यावसायिक लालसा

हाल के वर्षों में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में गन्ने की बंपर पैदावार दर्ज की गई है, जिसके पीछे सीधे तौर पर सिंधु बेसिन का प्रचुर जल और अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। इस भारी पैदावार के चलते पाकिस्तान की चीनी मिलों में चीनी का उत्पादन उसकी घरेलू खपत से काफी अधिक पहुंच गया है, जिससे वहां सरप्लस स्टॉक जमा हो गया है। अपनी चरमराई हुई अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार की भारी किल्लत से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह सरप्लस चीनी किसी वरदान से कम नहीं है। लेकिन पाकिस्तानी हुक्मरानों का दोमुंहापन तब खुलकर सामने आया जब वहां के उद्योगपतियों और व्यापारिक संगठनों ने इस अतिरिक्त चीनी को अंतरराष्ट्रीय बाजार के साथ-साथ सीधे तौर पर भारत के बाजारों, विशेषकर दिल्ली और उत्तरी राज्यों के कंज्यूमर्स तक खपाने की योजना बनानी शुरू कर दी। जो देश भारत के साथ हर तरह के व्यापारिक संबंधों को पूरी तरह काटने और दुश्मनी निभाने की कसमें खाता है, वही देश अपनी वित्तीय बदहाली को दूर करने के लिए भारतीय बाजार की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है।

भारत को बेचने की साजिश और इस्लामाबाद का खुला पाखंड

कूटनीतिक स्तर पर भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले पाकिस्तान की नीति और नीयत के बीच का यह विरोधाभास किसी से छिपा नहीं है। इस्लामाबाद के नीति निर्माताओं ने हमेशा से घरेलू जनता को यह दिखाने की कोशिश की है कि वे भारत के साथ किसी भी प्रकार का आर्थिक या राजनीतिक रिश्ता नहीं रखेंगे। इसके बावजूद, पिछले कुछ समय से पाकिस्तान के व्यापारिक गलियारों से यह खबरें लगातार आ रही हैं कि वे तीसरे देशों के रास्ते या अप्रत्यक्ष व्यापार के जरिए अपनी चीनी को भारतीय खरीदारों तक पहुंचाने के लिए बेताब हैं। दिल्ली और अन्य उत्तर भारतीय महानगरों में चीनी की मांग और बढ़ती कीमतों को भुनाने के लिए पाकिस्तानी व्यापारी हर मुमकिन तिकड़म भिड़ा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यह केवल एक साधारण व्यापारिक सौदा नहीं है, बल्कि पाकिस्तान का यह खुला पाखंड है कि वह एक तरफ भारत को अपना सबसे बड़ा दुश्मन बताता है और दूसरी तरफ अपनी खाली होती तिजोरी को भरने के लिए उसी देश के उपभोक्ताओं की गाढ़ी कमाई पर नजर गड़ाए बैठा है।

भारत की रणनीतिक और कूटनीतिक स्थिति पर पड़ता असर

पाकिस्तान की इस दोमुंही चाल और सिंधु जल संधि के दुरुपयोग को लेकर अब नई दिल्ली में भी सुगबुगाहट तेज हो गई है। भारतीय रणनीतिकारों का मानना है कि पाकिस्तान एक तरफ तो सिंधु जल संधि के प्रावधानों का फायदा उठाकर अपने खेतों की प्यास बुझा रहा है और दूसरी तरफ भारत विरोधी एजेंडे से पीछे हटने को तैयार नहीं है। हालांकि भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों का सम्मान किया है, लेकिन देश की सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। सरकार के भीतर और कूटनीतिक हलकों में अब इस बात पर भी गंभीर विचार चल रहा है कि क्या पाकिस्तान को दिए जा रहे जल संबंधी और अन्य लाभों की समीक्षा का समय आ गया है। भारत की सख्त नीतियों और बदलती कूटनीति के चलते पाकिस्तान के इन नापाक और स्वार्थी मंसूबों पर पानी फिरना लगभग तय माना जा रहा है, क्योंकि नई दिल्ली अब राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यापारिक हितों को लेकर पूरी तरह सतर्क है।