
सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। पंचांग के अनुसार, सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को ‘सावन पुत्रदा एकादशी’ या ‘पवित्रा एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। यह पावन व्रत कल विधि-विधान के साथ रखा जाएगा। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो दंपत्ति संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं या अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य और दीर्घायु की प्रार्थना करते हैं, उनके लिए यह व्रत अमोघ फलदायी माना जाता है।
साल में 2 बार क्यों आती है पुत्रदा एकादशी?
अक्सर श्रद्धालुओं के मन में यह सवाल उठता है कि एक ही नाम से साल में दो बार एकादशी का व्रत क्यों रखा जाता है। हिंदू पंचांग में दो पुत्रदा एकादशी का विधान है:
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पौष पुत्रदा एकादशी: यह एकादशी पौष मास (दिसंबर-जनवरी) के शुक्ल पक्ष में आती है। इसे मुख्य रूप से उत्तर भारत और देश के कई हिस्सों में विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
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सावन पुत्रदा एकादशी (पवित्रा एकादशी): यह सावन मास (जुलाई-अगस्त) के शुक्ल पक्ष में आती है। इसे गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारतीय राज्यों में पवित्रा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
दो बार व्रत रखने का पौराणिक और आध्यात्मिक कारण
शास्त्रों के अनुसार, वर्ष के दो मुख्य ऋतु चक्रों (शरद और वर्षा ऋतु) में आध्यात्मिक ऊर्जा का विशेष संचरण होता है। पौष माह सूर्य देव और धनु संक्रांति के प्रभाव में रहता है, जो अंतर्मुखी तपस्या के लिए उपयुक्त है। वहीं, सावन मास चातुर्मास का हिस्सा होता है, जब भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं और सृष्टि का संचालन महादेव के हाथों में होता है।
सावन के महीने में भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों का संयुक्त आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसलिए, जिन भक्तों से वर्ष के आरंभ में पौष एकादशी का व्रत छूट जाता है या जो पूर्ण श्रद्धा से वर्ष में दो बार संतान कल्याण के लिए संकल्प लेते हैं, उनके लिए यह दूसरा अत्यंत पावन अवसर होता है।
सावन पुत्रदा एकादशी का धार्मिक महत्व
पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, सावन पुत्रदा एकादशी की कथा सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथाओं में राजा सुकेतुमान और उनकी पत्नी चम्पा की कथा का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने संतान हीनता के दुख से मुक्ति पाने के लिए महर्षियों के परामर्श पर इस व्रत का पालन किया था और एक योग्य व यशस्वी पुत्र की प्राप्ति की थी।
यह व्रत न केवल संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी करता है, बल्कि संतान के जीवन में आने वाली बाधाओं, स्वास्थ्य समस्याओं और नकारात्मक प्रभावों को भी दूर करता है।
सावन पुत्रदा एकादशी: पूजा विधि और नियम
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प्रातः स्नान और संकल्प: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल युक्त जल से स्नान करें और पीले वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
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वेदी स्थापना: पूजा स्थान पर चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं और भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
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पंचामृत अभिषेक व पूजन: श्रीहरि को पंचामृत से स्नान कराएं। इसके बाद पीले पुष्प, चंदन, अक्षत, धूप, दीप और तुलसी दल अर्पित करें। ध्यान रहे कि बिना तुलसी दल के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते।
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मंत्र जाप: ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें और विष्णु सहस्रनाम या एकादशी महात्म्य का पाठ करें।
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आरती व दीपदान: शाम के समय तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक प्रज्वलित करें और भगवान की विधिवत आरती करें।
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पारण नियम: अगले दिन द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराएं, दान-दक्षिणा दें और इसके बाद ही सात्विक भोजन से व्रत का पारण करें।
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