नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसा दौर भी रहा है जब ‘सिद्धांत’ गौण हो गए थे और ‘सत्ता’ ही सर्वोपरि थी। आज जब हम एक मजबूत दलबदल विरोधी कानून के साये में खड़े हैं, तब 1967 से 1971 के उस कालखंड को याद करना जरूरी हो जाता है जिसे ‘अस्थिरता का युग’ कहा जाता है। यह वह दौर था जब मात्र चार साल के भीतर देश के विभिन्न राज्यों में 45 सरकारें बनीं और गिरीं। विधायकों की खरीद-फरोख्त और पाला बदलने की राजनीति इस कदर हावी थी कि महज 48 महीनों में 16 बार राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) लगाना पड़ा।
कांग्रेस के एकाधिकार का अंत और ‘संविद’ सरकारों का उदय
1967 के विधानसभा चुनावों ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी थी। आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस का अजेय रथ रुका और उसे उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और पश्चिम बंगाल सहित 8 प्रमुख राज्यों में बहुमत नहीं मिला। मद्रास (अब तमिलनाडु) में डीएमके ने बाजी मारी, तो अन्य राज्यों में ‘संयुक्त विधायक दल’ (संविद) के नाम से बेमेल गठबंधन की सरकारें बनीं। इन गठबंधनों में धुर दक्षिणपंथी जनसंघ और धुर वामपंथी दल एक साथ थे। वैचारिक शून्यता के कारण इन सरकारों में फूट पड़ना तय था, जिसने दलबदल के लिए उपजाऊ जमीन तैयार की।
हरियाणा बना दलबदल का केंद्र: एक दिन में तीन बार बदली पार्टी
दलबदल की राजनीति का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला उदाहरण हरियाणा में देखने को मिला। 1967 में कांग्रेस की सरकार बनने के एक हफ्ते के भीतर ही राव बीरेंद्र सिंह ने बड़ा गुट तोड़कर सरकार गिरा दी और ‘विशाल हरियाणा पार्टी’ बनाकर खुद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए। इसी दौरान विधायक गया लाल ने तो रिकॉर्ड ही बना दिया; उन्होंने मात्र नौ घंटे के भीतर तीन बार अपनी पार्टी बदली। इसी घटना के बाद भारतीय राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा मशहूर हुआ, जो आज भी दलबदलू नेताओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
बिहार में मची थी पराकाष्ठा: 4 साल में बदले 9 मुख्यमंत्री
राजनीतिक अस्थिरता का सबसे बुरा दौर बिहार ने देखा। 1967 से 1971 के बीच यहां नौ बार मुख्यमंत्री बदले गए। स्थिति यह थी कि विधायक सुबह किस खेमे में हैं और शाम को कहां होंगे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल था। बी.पी. मंडल ने ‘शोषित दल’ बनाकर कांग्रेस के समर्थन से मात्र 31 दिनों के लिए सरकार चलाई। उत्तर प्रदेश में भी चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस से बगावत कर ‘भारतीय क्रांति दल’ बनाया, लेकिन वैचारिक मतभेदों के चलते संविद सरकारें लंबे समय तक टिक नहीं सकीं।
मंत्री पद का लालच और राज्यपालों की भूमिका पर सवाल
उस दौर के आंकड़े बताते हैं कि दलबदल करने वाले हर आठवें विधायक को पुरस्कार के रूप में मंत्री पद (लाल बत्ती) दिया गया। करीब 1800 से अधिक विधायकों ने इन चार वर्षों में पाला बदला। इस खेल में केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर भी आरोप लगे कि उसने राज्यपालों के माध्यम से विपक्षी सरकारों को अस्थिर किया। गृह मंत्री वाई बी चव्हाण की अध्यक्षता वाली 1968 की समिति ने इस भयावह स्थिति पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट दी थी, जो आज भी दलबदल पर सबसे प्रमाणिक दस्तावेज मानी जाती है।
जनता का जवाब और इंदिरा गांधी की वापसी
लगातार गिरती सरकारों और मध्यावधि चुनावों से जनता त्रस्त हो चुकी थी। 1971 के आम चुनाव में लोगों ने इस अस्थिरता को नकार दिया। ‘मजबूत केंद्र’ और ‘स्थिर सरकार’ की चाहत में जनता ने इंदिरा गांधी को भारी बहुमत सौंपा। ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी ने दलबदल की उस पहली भीषण लहर पर कुछ समय के लिए लगाम लगा दी, लेकिन उस दौर के जख्मों ने ही आगे चलकर सख्त दलबदल विरोधी कानून की नींव रखी।
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