
आजकल की डिजिटल दिनचर्या, घंटों कंप्यूटर स्क्रीन के सामने झुककर काम करना, गलत पोजिशन में सोना और स्मार्टफोन पर लगातार गर्दन झुकाए रखना आम बात हो गई है। इसका सीधा और सबसे बुरा असर हमारी रीढ़ की हड्डी के ऊपरी हिस्से यानी गर्दन के मनकों पर पड़ता है। अक्सर लोग गर्दन में होने वाले दर्द या भारीपन को केवल दिनभर की थकान मानकर बाम या पेनकिलर खाकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन यह लापरवाही आगे चलकर एक गंभीर ऑर्थोपेडिक समस्या का रूप ले लेती है, जिसे मेडिकल भाषा में सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस (Cervical Spondylosis) कहा जाता है। सर्वाइकल केवल गर्दन की अकड़न तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जब गर्दन की कशेरुकाओं (Vertebrae) के बीच मौजूद डिस्क घिसने लगती है या वहां से गुजरने वाली नसें दबने लगती हैं, तो इसके लक्षण पूरे शरीर के ऊपरी हिस्सों में फैलने लगते हैं। न्यूरोलॉजिस्ट और हड्डी रोग विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि शरीर में कुछ खास चेतावनी संकेत समय रहते पहचान लिए जाएं, तो भविष्य में होने वाली सर्जरी और नसों के स्थाई नुकसान से बचा जा सकता है।
सर्वाइकल का सबसे प्राथमिक और क्लासिक लक्षण रेडिएटिंग पेन (Radiating Pain) है। यह कोई सामान्य मस्कुलर खिंचाव नहीं होता जो केवल गर्दन तक सीमित रहे। इसमें दर्द गर्दन के पिछले हिस्से से शुरू होता है और धीरे-धीरे कंधों, कॉलरबोन, बांहों, कोहनी और हाथ की उंगलियों तक नीचे की ओर उतरता है। कई बार मरीजों को ऐसा महसूस होता है जैसे बांह के भीतर कोई करंट दौड़ रहा हो या कोई तीखी सुई चुभो रहा हो। गर्दन को किसी एक दिशा में मोड़ने या सिर को ऊपर-नीचे करने पर यह दर्द अचानक बहुत तेज हो जाता है, जिससे दैनिक काम करना भी दूभर हो जाता है।
जब सर्वाइकल स्पाइन की विकृति के कारण रीढ़ की हड्डी से निकलने वाली नसें (Cervical Nerves) हड्डियों के बीच दबने लगती हैं, तो इसे सर्वाइकल रेडिकुलोपैथी कहा जाता है। नस दबने के कारण हाथों तक जाने वाले सिग्नल बाधित होने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूप मरीज को हथेलियों, कलाई और उंगलियों में लगातार झनझनाहट (Tingling Sensation) या सुन्नपन (Numbness) महसूस होता है। कई लोगों को ऐसा लगता है मानो उनके हाथ पर लगातार चींटियां रेंग रही हों। यह सुन्नपन विशेष रूप से अंगूठे, तर्जनी या कनिष्ठिका उंगली में अधिक देखा जाता है।
यदि सर्वाइकल की समस्या नसों की संवेदनशीलता से आगे बढ़कर मोटर नर्व्स को प्रभावित करने लगे, तो हाथों की मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगती हैं। इसका सबसे बड़ा संकेत यह है कि मरीज के हाथों की पकड़ (Grip) ढीली हो जाती है। चाय का कप पकड़ते समय हाथ कांपना, पेन से लिखते वक्त उंगलियों पर नियंत्रण न रहना, शर्ट के बटन लगाने में कठिनाई होना या हाथ में पकड़ी हुई चाबी या मोबाइल का अचानक अनजाने में नीचे गिर जाना इसके गंभीर लक्षण हैं। यदि आपको रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजों को उठाने में भी हाथ में कमजोरी महसूस हो रही है, तो यह संकेत है कि सर्वाइकल नर्व्स पर दबाव अत्यधिक बढ़ चुका है।
बहुत से लोग सिरदर्द होने पर उसे माइग्रेन या तनाव (Tension Headache) समझ लेते हैं, जबकि कई मामलों में सिरदर्द का स्रोत गर्दन होती है। इसे मेडिकल जगत में ‘सर्वाइकोजेनिक हेडेक’ (Cervicogenic Headache) कहा जाता है। जब गर्दन की ऊपरी तीन कशेरुकाएं (C1, C2, C3) और उनके आसपास की मांसपेशियां अकड़ जाती हैं, तो दर्द की तरंगें सिर के पिछले हिस्से यानी ऑक्सिपिटल एरिया से होते हुए सिर के ऊपरी हिस्से और आंखों के पीछे तक पहुंचती हैं। यह दर्द अक्सर एक तरफा होता है और गर्दन हिलाने पर और ज्यादा गंभीर हो जाता है। इसके साथ कई बार आंखों में धुंधलापन या भारीपन भी महसूस होता है।
सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस जब एडवांस स्टेज में पहुंचता है, तो यह मस्तिष्क तक जाने वाली रक्त वाहिकाओं (Vertebral Arteries) पर दबाव बनाने लगता है। इसके कारण दिमाग तक ऑक्सीजन युक्त रक्त का प्रवाह क्षणिक रूप से धीमा पड़ जाता है। नतीजा यह होता है कि जैसे ही मरीज सोकर उठता है, अचानक झुकता है या तेजी से गर्दन मोड़ता है, उसे कमरा घूमता हुआ महसूस होता है या सिर चकराने लगता है। इसे ‘सर्वाइकल वर्टिगो’ कहा जाता है। इसके साथ मरीज को जी मिचलाना, उल्टी जैसा महसूस होना, कानों में घंटी बजने जैसी आवाजें (टिनिटस) आना और चलते समय संतुलन बिगड़ने की शिकायत भी हो सकती है।
यदि आपको इनमें से दो या तीन लक्षण भी लगातार महसूस हो रहे हैं, तो तुरंत किसी योग्य ऑर्थोपेडिक सर्जन या न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करें। डॉक्टर आमतौर पर एक्स-रे (X-Ray) या नसों की वास्तविक स्थिति जांचने के लिए एमआरआई (Cervical MRI) कराने की सलाह देते हैं।
बचाव और राहत के लिए अपनी जीवनशैली में तुरंत बदलाव लाएं। काम करते समय अपने कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन को आंखों के बिल्कुल समानांतर (Eye Level) रखें ताकि गर्दन न झुकानी पड़े। हर 45 मिनट के काम के बाद 2 मिनट का ब्रेक लें और गर्दन को धीरे-धीरे क्लॉकवाइज व एंटी-क्लॉकवाइज घुमाएं। सोते समय बहुत ऊंचे या सख्त तकिए का इस्तेमाल बंद करें और उसकी जगह ऑर्थोपेडिक सर्वाइकल पिलो का चयन करें। पेट के बल सोने से बचें क्योंकि इससे गर्दन पर असामान्य मरोड़ पड़ती है। फिजियोथेरेपिस्ट की देखरेख में गर्दन की मांसपेशियों को मजबूत करने वाले आइसोमेट्रिक व्यायाम करें। बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से गर्दन पर किसी अनाड़ी से मालिश करवाने या तेज झटके से गर्दन चटकाने की गलती कभी न करें, क्योंकि इससे दबी हुई नस स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती है।
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