
मध्य पूर्व (Middle East) के भू-राजनीतिक समीकरणों में इस समय एक बहुत बड़ा और खामोश भूचाल आ रहा है, जिसने वैश्विक महाशक्तियों और रक्षा विशेषज्ञों की सांसे थाम दी हैं। रक्षा गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, रूस और ईरान के बीच सैन्य सहयोग अब एक ऐसे खतरनाक और रणनीतिक मोड़ पर पहुंच चुका है, जिसके बारे में पश्चिमी देशों ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। रूस कथित तौर पर ईरान को आधुनिक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल तकनीक ट्रांसफर करने की तैयारी में है, जिसे रक्षा जगत में ‘प्रोजेक्ट C430L’ (Project C430L) के नाम से कोडवर्ड दिया गया है। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद अब यह चर्चा जोर पकड़ चुकी है कि क्या ईरान को वैसी ही मारक क्षमता मिलने जा रही है, जैसी भारत के पास ब्रह्मोस (BrahMos) मिसाइल के रूप में मौजूद है? यदि यह रिपोर्ट सच साबित होती है, तो यह मध्य पूर्व और हिंद महासागर के समुद्री सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह से बदलकर रख देगी। तेहरान की इस नई सैन्य महत्वाकांक्षा और रूस के इस गुप्त प्रोजेक्ट के पीछे की पूरी सच्चाई क्या है, आइए इसका गहराई से विश्लेषण करते हैं।
क्या है रूस का गोपनीय प्रोजेक्ट C430L और ईरान के साथ इसका क्या है सीधा कनेक्शन
अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषकों और खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रूस और ईरान के बीच हाल के महीनों में हथियारों के तकनीक साझा करने को लेकर कई गुप्त समझौते हुए हैं। इसी कड़ी में ‘प्रोजेक्ट C430L’ का नाम सबसे ऊपर उभरकर सामने आ रहा है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य ईरान की सैन्य विनिर्माण इकाइयों को ऐसी एडवांस्ड प्रोपल्शन और गाइडेड मिसाइल टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराना है, जिससे वे ध्वनि की गति से भी तेज यानी सुपरसोनिक रफ्तार से चलने वाली क्रूज मिसाइलों का स्वदेशी उत्पादन कर सकें। अब तक ईरान के पास ज्यादातर बैलिस्टिक मिसाइलें या फिर धीमी गति से उड़ने वाली ड्रोन तकनीक थी, जो एयर डिफेंस सिस्टम की रडार पकड़ में आसानी से आ जाती हैं। लेकिन सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें बहुत कम ऊंचाई पर और बेहद तेज गति से उड़ान भरती हैं, जिससे दुश्मन के रडार और एंटी-मिसाइल डिफेंस शील्ड के लिए उन्हें हवा में ही नष्ट करना लगभग असंभव हो जाता है। रूस की ओर से इस तकनीक का हस्तांतरण ईरान की नौसैनिक और रणनीतिक ताकत को कई गुना बढ़ाने वाला है।
ब्रह्मोस जैसी मारक क्षमता: क्यों दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ी हुई है
भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम से बनी ‘ब्रह्मोस’ मिसाइल को दुनिया की सबसे घातक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है, जिसकी गति और सटीकता का कोई मुकाबला नहीं है। अब जब रूस वैसी ही या मिलती-जुलती तकनीक ईरान को देने जा रहा है, तो खाड़ी देशों, इजरायल और अमेरिका की चिंताएं सातवें आसमान पर पहुंच गई हैं। ईरान की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वह दुनिया के सबसे संवेदनशील तेल व्यापार मार्ग यानी ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को पूरी तरह नियंत्रित करता है। यदि तेहरान के पास सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें आ जाती हैं, तो वह फारस की खाड़ी से गुजरने वाले किसी भी अमेरिकी या पश्चिमी युद्धपोत को पलक झपकते ही निशाना बना सकता है। यह तकनीक न केवल ईरान की पारंपरिक रक्षा पंक्ति को मजबूत करेगी, बल्कि उसकी आक्रामक प्रतिरोधक क्षमता (Offensive Deterrence) को भी अभेद्य बना देगी, जिससे कोई भी देश ईरान पर सैन्य कार्रवाई करने से पहले सौ बार सोचेगा।
रूस और ईरान की रणनीतिक पार्टनरशिप और इसके वैश्विक भू-राजनीतिक निहितार्थ
यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस और ईरान के बीच के कूटनीतिक और सैन्य रिश्ते एक नए ही स्तर पर पहुंच चुके हैं। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे का साथ देने की जो कसम खाई है, उसका असर अब रक्षा क्षेत्र में साफ तौर पर दिखने लगा है। ईरान ने जहां रूस को ड्रोन और गोला-बारूद की आपूर्ति की थी, वहीं अब रूस इसके बदले में ईरान को अत्याधुनिक अंतरिक्ष, विमानन और मिसाइल तकनीक का तोहफा दे रहा है। प्रोजेक्ट C430L इसी मजबूत होती धुरी का एक मुख्य हिस्सा है। इस समझौते से अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए मध्य पूर्व में अपनी धमक बनाए रखना और अधिक कठिन हो जाएगा। हालांकि, पश्चिम एशिया में हथियारों की यह नई दौड़ क्षेत्रीय शांति के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि इससे इस सुलगते हुए भूभाग में तनाव और अधिक बढ़ने की पूरी आशंका है।
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