
मध्य पूर्व (Middle East) के सुलगते हुए भू-राजनीतिक परिदृश्य से इस वक्त की सबसे बड़ी, खौफनाक और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है, जिसने पूरी दुनिया की सांसें थाम दी हैं। अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ते तनाव के बीच अब ईरान ने बेहद आक्रामक और खामोशी को चीर देने वाला जोरदार पलटवार किया है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान समर्थित ताकतों और ईरानी सेना ने जॉर्डन (Jordan), कुवैत (Kuwait) और बहरीन (Bahrain) की सीमा के भीतर स्थित प्रमुख अमेरिकी सैन्य अड्डों और एयरबेस को अपने सटीक निशाने पर ले लिया है। इन रणनीतिक ठिकानों पर एक के बाद एक अत्याधुनिक बैलिस्टिक मिसाइलों और सुसाइड ड्रोन से ताबड़तोड़ हमले किए गए हैं, जिससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में हड़कंप मच गया है। इस खतरनाक और हिंसक घटनाक्रम के बाद वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर से पूर्णकालिक और विनाशकारी युद्ध की शुरुआत होने जा रही है? इस हाई-वोल्टेज संघर्ष और इसके दूरगामी परिणामों के हर एक पहलू को आइए विस्तार से और गहराई के साथ समझते हैं।
ईरान के इस भीषण पलटवार की पूरी कहानी और अमेरिकी ठिकानों पर तबाही का मंजर
पिछले कुछ हफ्तों से अमेरिका और ईरान के बीच जिस तरह की बयानबाजी और सैन्य धमकियां चल रही थीं, उसने इस बात के स्पष्ट संकेत दे दिए थे कि स्थिति किसी भी वक्त विस्फोटक हो सकती है। अमेरिकी सेना द्वारा खाड़ी देशों में अपनी रक्षा पंक्तियों को मजबूत करने और ईरान के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने के बाद तेहरान ने भी अब चुप बैठना मुनासिब नहीं समझा। ईरान ने अपनी पारंपरिक युद्ध नीति से हटकर बहु-दिशात्मक मिसाइल और ड्रोन स्ट्राइक का रास्ता चुना है। जॉर्डन, कुवैत और बहरीन वे देश हैं जहां अमेरिका के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण एयरफोर्स स्टेशन और लॉजिस्टिक्स हब स्थित हैं, जिनके जरिए अमेरिकी सेना पूरे मध्य पूर्व में अपनी गतिविधियों को संचालित करती है। ईरानी ड्रोनों और क्रूज मिसाइलों की गड़गड़ाहट से इन देशों के कई इलाकों में सायरन बज उठे और आसमान में धुएं के गुबार उठते देखे गए। इस हमले ने यह साबित कर दिया है कि ईरान अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए अब किसी भी हद तक जाने को तैयार है।
रणनीतिक रूप से बेहद अहम देशों जॉर्डन, कुवैत और बहरीन में बढ़े खतरे के बादल
मध्य पूर्व के नक्शे पर नजर डालें तो जॉर्डन, कुवैत और बहरीन अमेरिका के सबसे करीबी और पुराने सहयोगी देशों में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपनी जमीन पर अमेरिकी सैन्य अड्डों को लंबे समय से जगह दे रखी है। इन ठिकानों पर अमेरिकी वायुसेना के लड़ाकू विमान, रणनीतिक रडार सिस्टम और हजारों की संख्या में अमेरिकी सैनिक तैनात रहते हैं। जब ईरान ने इन देशों के भीतर स्थित ठिकानों को अपना निशाना बनाया, तो इसका मतलब साफ है कि तेहरान अब सिर्फ अपने घरेलू बचाव तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अमेरिका के क्षेत्रीय नेटवर्क की रीढ़ को तोड़ना चाहता है। इन हमलों के बाद जॉर्डन, कुवैत और बहरीन की सरकारों पर भी भारी कूटनीतिक दबाव आ गया है। एक तरफ जहां उन्हें अपनी संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा की चिंता सता रही है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के साथ उनके सामरिक समझौतों के चलते इस संकट से निपटना उनके लिए लोहे के चने चबाने जैसा साबित हो रहा है।
क्या एक बार फिर शुरू होगा खाड़ी का युद्ध? वैश्विक शांति पर मंडराया बड़ा खतरा
ईरान के इस जोरदार पलटवार के बाद से पूरी दुनिया की निगाहें वाशिंगटन और तेहरान के अगले कदमों पर टिकी हुई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल ही में दिए गए आक्रामक बयानों और उसके बाद हुए इन हमलों ने आग में घी डालने का काम किया है। यदि अमेरिका इस हमले के जवाब में बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई या जवाबी हवाई हमले करता है, तो मध्य पूर्व का यह सुलगता हुआ शोला एक भीषण क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है। इस तरह के संघर्ष का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल (Crude Oil) की आपूर्ति पर पड़ेगा, जिससे वैश्विक बाजार में ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों विदेशी नागरिकों और प्रवासियों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। आने वाले कुछ दिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक शांति के लिहाज से इतिहास के सबसे संवेदनशील और निर्णायक साबित होने वाले हैं।
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