
भारत को दुनिया की ‘डायबिटीज कैपिटल’ कहा जाता है, जहां करोड़ों लोग टाइप-2 डायबिटीज और प्रीडायबिटीज की चपेट में हैं। जब भी किसी परिवार या समाज में इस बीमारी की बात होती है, तो सबसे पहली सलाह यही दी जाती है—”चाय में चीनी बंद कर दो, मिठाइयां छोड़ दो, डायबिटीज कभी नहीं होगी।” लेकिन मेडिकल साइंस और एंडोक्रिनोलॉजिस्ट्स (हार्मोन विशेषज्ञ) इस आम धारणा को आधा-अधूरा और भ्रामक सच मानते हैं। हकीकत यह है कि केवल सफेद चीनी या मिठाइयों से तौबा कर लेने भर से आप इस गंभीर मेटाबॉलिक विकार से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाते। कई लोग जिंदगी भर मीठे से परहेज करते हैं, फिर भी 40 की उम्र पार करते ही उनका फास्टिंग शुगर और HbA1c लेवल खतरे के निशान को पार कर जाता है। ऐसा क्यों होता है? डायबिटीज असल में चीनी की अधिकता से नहीं, बल्कि शरीर में ‘इंसुलिन रेजिस्टेंस’ (Insulin Resistance) पैदा होने से शुरू होती है।
टाइप-2 डायबिटीज तब होती है जब हमारा पैंक्रियाज (अग्न्याशय) पर्याप्त इंसुलिन हार्मोन नहीं बना पाता, या फिर शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के संकेतों को पहचानना बंद कर देती हैं। इंसुलिन का काम खून में मौजूद ग्लूकोज को कोशिकाओं के अंदर पहुंचाना होता है ताकि शरीर को ऊर्जा मिल सके। जब कोशिकाएं इंसुलिन का विरोध (रेजिस्टेंस) करने लगती हैं, तो ग्लूकोज कोशिकाओं में जाने के बजाय खून में ही तैरता रहता है, जिससे ब्लड शुगर बढ़ जाता है। सफेद चीनी या मीठी चीजें कैलोरी से भरपूर होती हैं और वजन बढ़ाती हैं, जो परोक्ष रूप से इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा दे सकता है। लेकिन चीनी खुद सीधे तौर पर डायबिटीज की एकमात्र जड़ नहीं है। यदि आप मीठा बिल्कुल नहीं खाते, लेकिन आपकी जीवनशैली और डाइट के अन्य घटक बिगड़े हुए हैं, तो पैंक्रियाज पर उतना ही बुरा असर पड़ता है जितना कि मीठा खाने वाले पर।
डायबिटीज विशेषज्ञों के अनुसार, रक्त में शर्करा का असंतुलन पैदा करने में चीनी से कहीं ज्यादा खतरनाक भूमिका उन छिपे हुए कारणों की होती है जिन्हें हम अक्सर हेल्दी या सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।
अधिकांश भारतीय थाली में मैदा, सफेद चावल, सफेद ब्रेड, नान, समोसा, कचौड़ी और पैकेज्ड नूडल्स की भरमार होती है। इन खाद्य पदार्थों का ‘ग्लाइसेमिक इंडेक्स’ (GI) बहुत ऊंचा होता है। जब आप एक प्लेट सफेद चावल या मैदे से बनी चीजें खाते हैं, तो पाचन तंत्र इन्हें कुछ ही मिनटों में सीधे ग्लूकोज में बदल देता है। यह स्पाइक टेबल शुगर खाने जितना ही तीव्र होता है। लगातार इस तरह का सिंपल कार्ब्स वाला भोजन करने से पैंक्रियाज को बार-बार भारी मात्रा में इंसुलिन छोड़ना पड़ता है, जिससे कुछ ही वर्षों में बीटा कोशिकाएं थक जाती हैं और इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा हो जाता है।
अगर आपका वजन सामान्य दिखता है, लेकिन पेट के आसपास चर्बी (Visceral Fat) जमा है, तो आप डायबिटीज के सबसे बड़े रडार पर हैं। इसे ‘थिन-फैट इंडियन सिंड्रोम’ कहा जाता है। आंतों, लिवर और पैंक्रियाज के आसपास जमा यह जिद्दी वसा शरीर में साइटोकिन्स नामक इन्फ्लेमेटरी केमिकल्स छोड़ती है। ये रसायन कोशिकाओं की इंसुलिन संवेदनशीलता को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं। यही वजह है कि दुबले-पतले दिखने वाले भारतीय भी भारी पेट के कारण तेजी से प्रीडायबिटिक हो रहे हैं।
मांसपेशियां शरीर में ग्लूकोज का सबसे बड़ा उपभोक्ता (सिंक) होती हैं। जब आप चलते-फिरते हैं, सीढ़ियां चढ़ते हैं या एक्सरसाइज करते हैं, तो मांसपेशियां बिना इंसुलिन की ज्यादा मदद के भी सीधे खून से शुगर सोख लेती हैं। लेकिन अगर आपकी दिनचर्या ऐसी है जहां 8 से 10 घंटे कुर्सी पर बैठकर काम करना, लिफ्ट का इस्तेमाल और कोई वर्कआउट न करना शामिल है, तो मांसपेशियों की ग्लूकोज सोखने की क्षमता खत्म हो जाती है। निष्क्रिय जीवनशैली सीधे तौर पर इंसुलिन रिसेप्टर्स को सुस्त बना देती है।
आजकल के तनावपूर्ण माहौल में लगातार बना रहने वाला मानसिक तनाव डायबिटीज का एक बड़ा साइलेंट ट्रिगर है। जब आप तनाव में होते हैं, तो एड्रिनल ग्रंथियां ‘कोर्टिसोल’ और ‘एड्रेनालाईन’ जैसे स्ट्रेस हार्मोन्स का स्राव बढ़ा देती हैं। ये हार्मोन शरीर को ‘फाइट या फ्लाइट’ मोड में रखने के लिए लिवर में जमा ग्लाइकोजन को तोड़कर खून में ग्लूकोज की बाढ़ ला देते हैं। यदि तनाव हफ्तों और महीनों तक लगातार बना रहे, तो बिना एक दाना मीठा खाए भी व्यक्ति का ब्लड शुगर लगातार हाई रहने लगता है।
रोजाना 6 घंटे से कम की अधूरी नींद या खर्राटों के साथ स्लीप एपनिया की समस्या शरीर के मेटाबॉलिज्म को बुरी तरह प्रभावित करती है। नींद पूरी न होने पर शरीर में घ्रेलिन (भूख बढ़ाने वाला हार्मोन) बढ़ जाता है और लेप्टिन घट जाता है, साथ ही इंसुलिन संवेदनशीलता में 30 से 40 प्रतिशत तक की तुरंत गिरावट दर्ज की जाती है। इसके अलावा, बाजार में बिकने वाले ‘शुगर-फ्री’ या ‘डाइट’ लेबल्ड प्रोडक्ट्स, पैकेज्ड नमकीन, बिस्कुट और सॉस में भारी मात्रा में पाम ऑयल, सोडियम और छिपे हुए स्टार्च होते हैं जो लिवर में फैट जमा करके फैटी लिवर और अंततः डायबिटीज का कारण बनते हैं।
यदि आपके माता-पिता या दोनों में से किसी एक को टाइप-2 डायबिटीज है, तो आपकी जेनेटिक संरचना में इस बीमारी के विकसित होने का जोखिम 40 से 70 प्रतिशत तक पहले से मौजूद होता है। जेनेटिक्स आपकी बंदूक में गोली लोड करता है, लेकिन उसे चलाने का काम आपकी जीवनशैली करती है। अगर परिवार में शुगर का इतिहास है, तो सिर्फ चीनी छोड़ना पर्याप्त नहीं है; आपको कम उम्र से ही नियमित प्रिवेंटिव हेल्थ चेकअप और वजन नियंत्रण पर काम करना होगा।
डायबिटीज की रोकथाम केवल मीठे के त्याग से नहीं, बल्कि समग्र जीवनशैली सुधार से संभव है। अपनी थाली के आधे हिस्से को हरी सब्जियों, सलाद और फाइबर से भरें, एक चौथाई हिस्से में दाल, पनीर, अंडा या मछली जैसे प्रोटीन्स रखें और केवल एक चौथाई हिस्से में ही जटिल कार्बोहाइड्रेट्स (जैसे बाजरा, ज्वार, रागी या ब्राउन राइस) शामिल करें।
सप्ताह में कम से कम 150 मिनट का मध्यम व्यायाम—जैसे 30 मिनट की तेज चाल (Brisk Walk) और हल्के स्ट्रेंथ ट्रेनिंग व्यायाम जरूर करें ताकि मांसपेशियां सक्रिय रहें। हर रात 7 से 8 घंटे की गहरी नींद लें और तनाव प्रबंधन के लिए प्राणायाम या योग का सहारा लें। यदि आपकी उम्र 30 वर्ष से अधिक है, तो साल में कम से कम एक बार HbA1c टेस्ट और फास्टिंग इंसुलिन टेस्ट कराकर अपने इंसुलिन रेजिस्टेंस के स्तर की समय रहते जांच अवश्य कराएं।
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