Modi Pezeshkian Meet Bishkek: बिश्केक में पीएम मोदी और ईरानी राष्ट्रपति की मुलाकात से हिला अमेरिका! ट्रेड डील और चाबहार पर नई चेतावनी, जानिए वॉशिंगटन की बेचैनी की पूरी इनसाइड स्टोरी

किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन से इतर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के बीच हुई अहम द्विपक्षीय बैठक ने वैश्विक भू-राजनीति में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी है। पश्चिम एशिया में चल रहे भीषण भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका द्वारा तेहरान की आर्थिक घेराबंदी के बीच दोनों शीर्ष नेताओं ने न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देने का संकल्प दोहराया, बल्कि दोनों देशों के बीच व्यापार के दायरे (Trade Basket) को विस्तार और विविधता देने पर भी खुलकर सहमति जताई। इस कूटनीतिक गर्मजोशी और संभावित व्यापार समझौते की आहट से वॉशिंगटन के नीति-नियंता असहज हो उठे हैं और अमेरिका की ओर से तत्काल आर्थिक प्रतिबंधों (Sanctions) की सख्त चेतावनी जारी कर दी गई है।

किर्गिस्तान के बिश्केक में एससीओ बैठक के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के बीच यह पहली औपचारिक आमने-सामने की विस्तृत बैठक थी। बैठक के बाद पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि भारत और ईरान के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संबंध बेहद मजबूत हैं और आने वाले समय में दोनों देश अपने ट्रेड बास्केट को तेजी से विस्तार देना चाहते हैं।

विदेश मंत्रालय (MEA) और ईरानी बयानों के मुताबिक वार्ता में मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर रणनीतिक सहमति बनी:

  • व्यापार और आर्थिक सहयोग: ऊर्जा, कृषि, फार्मास्यूटिकल्स, तकनीकी क्षेत्र और गैर-तेल उत्पादों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने पर चर्चा हुई।

  • चाबहार बंदरगाह और कनेक्टिविटी: चाबहार पोर्ट के माध्यम से इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) को गति देने और मध्य एशिया तक भारत की सीधी पहुंच को बरकरार रखने की प्रतिबद्धता दोहराई गई।

  • पश्चिम एशिया में शांति व नेविगेशन की स्वतंत्रता: पीएम मोदी ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में व्यावसायिक जहाजों, नाविकों और आम नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए सभी विवादों को कूटनीति और संवाद से सुलझाने पर बल दिया।

  • ब्रिक्स समिट का आमंत्रण: प्रधानमंत्री मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने का न्योता भी दिया।

व्हाइट हाउस और अमेरिकी विदेश विभाग के माथे पर इस बैठक के बाद चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। अमेरिका ने हाल ही में ईरान पर चौतरफा दबाव बनाने के लिए ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ शुरू किया है, जिसके तहत डिजिटल एसेट्स, शिपिंग, टेक्नोलॉजी, सोना और एविएशन जैसे 5 प्रमुख आर्थिक सेक्टरों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। अमेरिका की पूरी कोशिश ईरान को वित्तीय रूप से वैश्विक व्यवस्था से अलग-थलग करने की है।

ऐसे माहौल में दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी और सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भारत का ईरान के साथ खुलकर व्यापार बढ़ाने की बात करना अमेरिकी रणनीति को बड़ा झटका देता है। अमेरिका को डर है कि:

  • यदि भारत और ईरान के बीच स्थानीय मुद्राओं (रुपया-रियाल तंत्र) में व्यापार बहाल या विस्तारित होता है, तो अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व और प्रतिबंधों की धार कुंद पड़ जाएगी।

  • चाबहार पोर्ट के माध्यम से होने वाला व्यापार यूरेशिया और रूस तक एक ऐसा वैकल्पिक सप्लाई रूट बना देगा, जिसे अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी या प्रतिबंधों से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

  • रणनीतिक रूप से निष्पक्ष भारत यदि ईरान को आर्थिक सहारा देता है, तो मध्य पूर्व में पश्चिमी दबाव की नीति बेअसर साबित हो सकती है।

पीएम मोदी और पेजेश्कियन की मुलाकात के फौरन बाद अमेरिकी विदेश विभाग और ट्रेजरी सेक्रेटरी की ओर से सख्त संदेश जारी किए गए। अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि कोई भी देश ऐसा रास्ता न बनाए जिससे ईरान को आर्थिक ऑक्सीजन या कमाई का जरिया मिले। वॉशिंगटन ने दोहराया कि जो भी देश या विदेशी संस्थाएं प्रतिबंधित क्षेत्रों में ईरान के साथ वित्तीय लेनदेन करेंगी, उन्हें अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है या डॉलर क्लियरिंग सिस्टम से बाहर किया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी ईरान से जुड़े कथित पेट्रोकेमिकल लेन-देन के आरोप में अमेरिका भारतीय मूल की कुछ निजी कंपनियों पर कार्रवाई कर चुका है, जिससे वह भारत पर परोक्ष दबाव बनाने की कोशिश में जुटा है।

अमेरिकी धमकियों और पाबंदियों की आशंकाओं के बावजूद भारत का रुख पूरी तरह संतुलित और ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ (रणनीतिक स्वायत्तता) पर आधारित है। नई दिल्ली ने हर वैश्विक मंच पर यह स्पष्ट किया है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और यूरेशियाई कनेक्टिविटी के लिए फैसले स्वतंत्र रूप से लेता है।

  • चाबहार का रणनीतिक महत्व: भारत के लिए चाबहार सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, बल्कि पाकिस्तान को बाइपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों से जुड़ने का लाइफलाइन कॉरिडोर है।

  • विश्व मित्र की भूमिका: ईरानी राष्ट्रपति ने खुद पीएम मोदी से अपील की है कि भारत अपने व्यापक अंतरराष्ट्रीय संपर्कों का इस्तेमाल कर मध्य पूर्व में युद्ध और रक्तपात को रोकने में मध्यस्थ की भूमिका निभाए। भारत जहां एक ओर इजराइल और अमेरिका के साथ गहरे रक्षा व रणनीतिक संबंध साझा करता है, वहीं ईरान के साथ उसके हजारों साल पुराने ऐतिहासिक संबंध हैं।

बिश्केक में हुई इस उच्चस्तरीय मुलाकात ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि बहुध्रुवीय (Multipolar) विश्व व्यवस्था में भारत किसी भी महाशक्ति के एकतरफा प्रतिबंधों के दबाव में आकर अपने दीर्घकालिक क्षेत्रीय और आर्थिक हितों की अनदेखी करने को तैयार नहीं है।