जिसने ‘भारत विरोधी’ मुइज्जू को बना दिया दिल्ली का शुक्रगुजार, जानिए क्यों है यह मेगा प्रोजेक्ट इतना खास

भारत और मालदीव के बीच कूटनीतिक रिश्तों में पिछले कुछ समय में आए उतार-चढ़ाव किसी से छिपे नहीं हैं। एक समय था जब मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के सत्ता संभालने के बाद दोनों देशों के बीच दूरियां बढ़ने की खबरें लगातार सामने आ रही थीं और इसे राजनीतिक हलकों में ‘भारत विरोधी’ रुख के तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन कूटनीति की दुनिया में कब समीकरण बदल जाएं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण इन दिनों मालदीव की राजधानी माले के पास बन रहा थिलामाले ब्रिज (Thilamale Bridge) प्रोजेक्ट है। भारत के सहयोग और वित्तीय सहायता से तैयार हो रहा यह बुनियादी ढांचा न केवल मालदीव की अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित होने वाला है, बल्कि इसी मेगा प्रोजेक्ट ने राष्ट्रपति मुइज्जू को भी नई दिल्ली का शुक्रगुजार होने पर मजबूर कर दिया है। आखिर क्या है इस प्रोजेक्ट की पूरी कहानी और क्यों यह भारत और मालदीव की दोस्ती की नई धुरी बन रहा है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

भारत की मदद से आकार ले रहा मालदीव का सबसे बड़ा बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट

मालदीव की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वहां के विभिन्न द्वीपों के बीच संपर्क स्थापित करना एक बहुत बड़ी चुनौती रही है। इसी चुनौती से पार पाने के लिए भारत सरकार के वित्तीय और तकनीकी सहयोग से ‘Greater Male Connectivity Project’ यानी थिलामाले ब्रिज का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। यह मालदीव के इतिहास का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है, जो राजधानी माले को विलीमाले, थिलाफुशी और गुलिफाहू जैसे प्रमुख द्वीपों से जोड़ेगा। इस पुल के बन जाने से मालदीव में माल की ढुलाई, व्यापारिक गतिविधियों और रोजाना आने-जाने वाले नागरिकों के लिए सफर बेहद आसान हो जाएगा। भारत की तरफ से इस प्रोजेक्ट के लिए दी गई भारी-भरकम आर्थिक मदद और ग्रांट ने यह साबित कर दिया है कि भारत अपने पड़ोसी देशों के विकास के लिए हमेशा सबसे आगे खड़ा रहता है, चाहे राजनीतिक स्तर पर कैसी भी हवा चल रही हो।

कूटनीतिक बदलाव और मोहम्मद मुइज्जू के रुख में आया नरम रवैया

जब मोहम्मद मुइज्जू मालदीव के राष्ट्रपति बने थे, तो उनके राजनीतिक कैंपेन में ‘इंडिया आउट’ का नारा काफी सुर्खियों में रहा था। शुरुआती दिनों में ऐसा लगा कि शायद मालदीव पारंपरिक रूप से भारत के साथ रहे अपने गहरे रिश्तों से दूरी बना लेगा और चीन की तरफ झुकाव बढ़ा लेगा। हालांकि, यथार्थ की राजनीति और देश की आर्थिक जरूरतें जब सामने आईं, तो वास्तविकता बिल्कुल अलग साबित हुई। मालदीव की चरमराती अर्थव्यवस्था को उबारने और देश में रोजगार और विकास के पहियों को गति देने के लिए थिलामाले ब्रिज जैसे प्रोजेक्ट्स का समय पर पूरा होना बेहद जरूरी था। जब चीनी परियोजनाओं की धीमी रफ्तार और कर्ज के जाल को मालदीव की सरकार ने समझा, तब उन्हें यह अहसास हुआ कि भारत उनका सबसे भरोसेमंद और सच्चा विकास साझेदार है। यही वजह है कि राष्ट्रपति मुइज्जू के बयानों में अब भारत के प्रति नरमी और आभार साफ तौर पर देखने को मिलता है।

थिलामाले ब्रिज की तकनीकी विशेषताएं और इकोनॉमी पर पड़ने वाला असर

यह पुल केवल कंक्रीट और स्टील का ढांचा नहीं है, बल्कि यह मालदीव के भविष्य के आर्थिक विकास की मजबूत नींव है। आधुनिक इंजीनियरिंग और पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों का इस्तेमाल करके बनाए जा रहे इस थिलामाले ब्रिज प्रोजेक्ट की लागत करोड़ों डॉलर में है, जिसका एक बड़ा हिस्सा भारत की ओर से सहायता और रियात्री ऋण के रूप में प्रदान किया गया है। इस पुल के शुरू होने से माले शहर में वाहनों की भारी भीड़ और ट्रैफिक जाम से बड़ी राहत मिलेगी। इसके साथ ही, थिलाफुशी इंडस्ट्रियल ज़ोन तक भारी वाहनों की आवाजाही सुगम होने से मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा। मालदीव के आम नागरिकों से लेकर बड़े कारोबारियों तक, हर कोई इस बात को मान रहा है कि भारत का यह प्रोजेक्ट उनके जीवन स्तर को सुधारने में एक मील का पत्थर साबित होगा।

भारत की नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी और क्षेत्रीय सुरक्षा का नया आयाम

भारत की विदेश नीति में ‘नेबरहुड फर्स्ट’ यानी पड़ोसी पहले की नीति को हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। थिलामाले ब्रिज इस नीति का सबसे जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है। हिंद महासागर क्षेत्र (Indo-Pacific Region) में रणनीतिक स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए मालदीव का भारत के साथ अच्छे संबंध रखना बेहद आवश्यक है। चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत ने कूटनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए विकास कार्यों और जनहित की परियोजनाओं को प्राथमिकता दी है। इसका परिणाम यह हुआ कि मालदीव के नेतृत्व को यह समझ आ गया कि भारत किसी भी देश की संप्रभुता का सम्मान करते हुए केवल वास्तविक विकास में विश्वास रखता है। इस तरह, थिलामाले ब्रिज ने न केवल दो द्वीपों को जोड़ा है, बल्कि दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास और कूटनीतिक रिश्तों की खाइयों को भी पाट दिया है।